व्यक्ति एक बार भी जीवन में धोखा दे तो उससे सतर्क हो जाएं

सूर्य नारायण महतो (सूरज) 13 मिनट 5/23/2020
व्यक्ति एक बार भी जीवन में धोखा दे तो उससे सतर्क हो जाएं

व्यक्ति एक बार भी जीवन में धोखा दे तो उससे सतर्क हो जाएं

लेखक : सूर्य नारायण महतो (सूरज)

यह कहानी लेखक का अपने 65 सालों के जीवन का अनुभव भरी उपदेश है। लेखक को विश्वास है कि इसे जीवन में धारण करने से जीने का शैली आनंद में बदल जाएगा। जीवन में तनाव कम हो जाएगा या दिमाग में तनाव आएगा ही नहीं। स्वस्थ जीवन जी सकते हैं।

यह छोटा सा प्रयास है उन नौजवानो के लिए, यह एक छोटा सा प्रयास है उन बुजुर्गों के लिए जो की 60 वर्ष की आयु पार कर चुके हैं।

इस कहानी के पात्र काल्पनिक है तथा नाम व स्थान भी काल्पनिक है। किसी के परिवार, स्थान या नाम से यह कहानी मिलती है, तो यह एक संयोग मात्रा है।

हाँ, हो सकता है यह कहानी का रस जो मैं आपको बताना चाहता हूं, आज के समाज में गरीब, अमीर, नेता, पार्टिया राजनैतिक तथा धर्मगुरुओं के खेमों में, व्यापारियों में हर घर में घटित होती होगी।

इसलिए इस कहानी को जरूर पढ़िए और इस तरह के लोगों से, संस्थाओं से, दुकानदारों से, सगे-संबंधियों से , अपने डॉक्टरों से भी, यहाँ तक की अपनी पत्नी से भी, अपने पति से भी, अपने माता-पिता से भी एवं अपने बेटा-बेंटियों से भी सतर्क रहें।

नहीं तो 60 वर्षो की उम्र के बाद अगर जिंदगी रह गयी तो, इस युग में कोई अपना नहीं समझ में आएगा, रोड पर या किसी बृद्धाश्रम में, या किसी सरकारी अस्पताल में पड़े-पड़े मौत की भीख मांगते रहेंगे। आपकी जिंदगी बत्त-से-बत्तर हो जाएगी।

इसलिए इस कहानी को।
पढ़िए जरूर, अमल में लाएं।।
जिंदगी आनंद से बिताए।।।
सतर्क रहें जीवन जीए ।।।।
- लेखक

प्रेमसागर और सूरज आज बहुत खुश है। क्यों ना हो आज, चार धाम का आखिरी पड़ाव है बद्रीनाथ और एक बात विशेष है कि आज रक्षाबंधन और स्वाधीनता दिवस 15 अगस्त भी है। शाम के 4 बजे है, काली कमली वाला बाबा के धर्मशाला में बैठे हैं, ठंडा तो बहुत है, लेकिन अच्छा लग रहा है ।

सूरज ने प्रेमसागर को काहा आओ और नजदीक, एक बात याद आ गई तुम्हें सुनाता हूँ।

अपने यहाँ मधुबनी में उनलोगो की हालत सुनकर एक उपदेश दिए थे, याद है क्या ?

व्वक्ति एक बार भी जीवन में धोखा दे तो उससे सतर्क हो जाना चाहिए। उससे प्रेम रखिए, मित्रता रखिए एवं संबंध रखिये, सब जैसा था वैसे ही रखिए, लेकिन उस व्यक्ति पर दोबारा भरोसा व विश्वास मत रखिए।

उस व्यक्ति ने आपको छोटा सा धोखा, छोटी सा तकलीफ हुई, थोड़ा खून बहा, थोड़ी चोट लगी, थोड़ा धन की हानि हुई । उस पर फिर विश्वास कीजिएगा तो आगे उससे बड़ा धोखा देगा, आपकी जिंदगी भी बर्बाद हो सकती है। आज छोटा धोका दिया कल बहुत बड़ा धोखा देगा।

एक परिवार है जो इस उपदेश को अपने जीवन में उतरा उस परिवार का कहानी बताता हूँ।

प्रेमसागर गौर से सुनो

दरभंगा में गंगाराम नाम का एक व्यक्ति है। उसकी पत्नी का नाम विमला है, उसकी दो लड़कियाँ एवं दो लड़के है। लड़कियाँ दोनों बड़ी ही। बड़ी वाली का नाम नीतू , छोटी का नाम काजल है।

नीतू और काजल की शादी हो गई समय पर, दोनों अपने-अपने घर में सुखी है।

बड़ा लड़का का नाम बबलू जो की पढ़ा लिखा है, उसकी भी शादी पढ़ी-लिखी लड़की से हो गई है। दुल्हन का नाम चिंतामणि जो की बहुत ही सुंदर एवं चालाक है।

दूसरा लड़का का नाम राजू जो इंजीनियर दिल्ली में है। उसकी भी शादी हो गई, दुल्हन प्रीति कुमारी पढ़ी-लिखी इंजीनियर की की है । यह तो और भी तेज-तर्राक और शारीरिक रूप से आलसी है, सामने से बोलकर किसी को भी अपने खिलाफ नहीं होने देती है। पाँच साल की एक बच्ची भी है, जो की वही पढ़ रही है। यह लोग साल में पर एक बार 10-15 दिनों के लिए आते है दरभंगा फिर चली जाती है।

गंगाराम और विमला बड़ा बेटा बबलू के साथ रहते है एवं खुश है।

बबलू के लड़कों को गंगाराम मिट्टी का गुल्लक खरीद कर दिए थे । जिसमे अपने भी रोज बच्चों को खुश करने के लिए 5-10 रूपया डाल दिया करते थे। कभी-कभी कोई रिस्तेदार घर पर आ जाये तो बच्चों को पैसा दे देते थे जो की उस गुल्लक में जमा कर दिया जाता था।

छह माह पर उस गुल्लक को तोड़कर जो पैसा निकालता था उसे व्यापार में लगा दिया जाता। खाता-बही में उन दोनों बच्चों के नाम से भी खाता खोल दिया गया था और व्यापार में उतने की पैसो का शेयर बना दिया गया था।

यह रिवाज गंगाराम इसलिए बनाया, की बच्चो को पैसा जमा करने की आदत लगेगी और फालतू की चीजों में पैसा नहीं खर्च करेंगे।

गंगाराम एक दिन देखे की गुल्लक नहीं है। घर में पूछने पर पता चला की वह तो फूट गया।

गुल्लक में पैसा गिनती का कितना था ?

तो जवाब में बड़ी दुल्हन चिंतामणि बतायी लगभग 700 रूपया था। क्या हुआ? आपका बेटा जाने।

तुम नहीं जानती ?

नहीं!!

बस यही छोटा सा धोखा गंगाराम को लेखक के उपदेश को याद दिला दिया, और गंगाराम चुप हो गए।

उस दिन से बड़ी बहू चिंतामणि से उनके माता-पिता से सभी तरह के संबंध निभाते हुए सतर्क रहे, अब कोई जिम्मेदारी व विश्वास रखने वाला काम उन्हें नहीं दिया जाता था ।

एक दिन बबलू को छोटा भाई राजू ने फोन किया।

भैया मेरी तनख्वा बढ़कर 40 हजार हो गया है।

बबलू खुसी से चिंतामणि को कहने गया की राजू का फोन आया है की उसका तनख्वा बढ़ गयी है।

चिंतामणि झल्लाते हुए बोली, तो जाइए नाचिये। कब से कहती हूँ की आंख खोलिए, नहीं तो पछताएगा।

इस बात को गंगाराम खुद सुन लिये, विमला भी वही थी।

सुने चिंतामणि की आवाज, सूरज जी(लेखक) का उपदेश सही है। अब हम लोग भी सतर्क हो जाए नहीं तो रोड पर यह लोग फेक देगा।

आज ही राजू को फोन कर कह दीजिए की, रूपया जो हर महीने भेजता है वह मम्मी के खाते में भेजे। ताकि उस पैसे से राजू का जो कर्ज है वह चूका दिजियेगा।

अब बड़की बहु का सब पार घाट लग गया। उसके बच्चे भी अब बड़ा हो गया , पोसा गया। अब नाटक ड्रामा सुरु करेगी और बटवारा करवा कर ही दम लेगी।

गंगाराम राजू को फोन करके बता देता है कि, अब तुम रुपैया भेजना तो मम्मी के अकाउंट में भेजना और तुम अपना ख्याल रखना।

गंगाराम फोन रख कर, विमला तुम घर में अच्छा माहौल बनाकर रखो सिर्फ सतर्क रहो। आईन्दा चिंतामणि को तुम जो दिल खोल कर सब बात बता देती थी वह सब बंद करो।

फोन आया था कागज का, कल दोनों बहन साथ आएगी मेहमान भी आ रहे हैं, शायद दो-चार दिन यही रहेंगे। तो आप कल घर पर ही रहियेगा, क्योंकि बबलू का कोई ठीक नहीं कहां रहेगा।

काजल और नीतू अपने पूरे परिवार के साथ आई, शाम का नाश्ता बनाया गया। रात का खाना बनाने वक्त चिंतामणि बबलू से जोर से बोली-- देखिए जी इन लोगों का भंडारा उतारना हम से नहीं होगा।

इस बात को नीतू और काजल ने सुन लिया। अब क्या था काजल रोना शुरु कर दी, यह बात गंगाराम भी सुन लिये थे।

रात में कोई मेहमान नहीं खाये।

सुबह से गंगाराम बड़ी बहु चिंतामणि को एकांत में समझाने गये--

देखो बेटी यह सब तुम्हें नहीं बोलना चाहिए, जाओ दीदी तुमसे उम्र में बड़ी है, बोल दो दीदी मुझे माफ कर दीजिए हम से गलती से बोला गया...

नहीं हम माफ़ीनहीं मांगेंगे!!!

तब तक बबलू भी आ गया क्या बात है पिताजी?

गंगाराम सभी बातें बताये।

तुरन्त बबलू भी पलट कर कहता है कि, क्या गलत किया? आखिर चिंता बोल ही दी तो क्या हुआ? आखिर तो वही खाना बनाती है, सब काम करती है। उन लोगों को इस बात को मन में नहीं लगाना चाहिए।

अरे तुम भी अब जोरू का गुलाम हो गया। तो मम्मी हम क्या करे?

लो रो रही है, तुम लोग ही संभालो इसे और तो चला।

तो, बड़ी बहू माफी नहीं मांग मानेंगे?

चिंतामणि बोल उठी, मैं माफी नहीं मागूँगी।

आप एक बार ऐसे ही कोई बात हुई, उसके लिए राजू के शादी में मुझे घृतधारी नहीं करने दिये। क्योंकि उस समय भी काजल दीदी को कोई बात की मुझसे तकलीफ हुई थी। वो बोली थी कि, यदि राजू के शादी में चिंता कोई रस्म करेगी तो हम लोग नहीं आएंगे।

और आप लोगो ने मुझे हर रस्म से वंचित कर दिया ताकि काजल और नीतू दीदी खुश रहे।

इस बार भी आप लोगों को जो मन में आये वही कीजिए, मैं अपने समझ से कोई गलती नहीं की।

हाथ जोड़कर माताजी और पिताजी मुझे छोड़ दीजिए।

गंगाराम और विमला एक साथ बैठकर सोचते हुए--

क्या करोगे ? विमला बोली क्या करेंगे कुछ नहीं। अब यह लोग परिपक्व हो गए हैं, बाल बच्चा का भी पालन पोषण हो गया है। अब यह लोग बटवारा चाहते हैं तो क्या ? आप स्थिर रहिये, बबलू को ही कहने दीजिए।

केवल आप अपना पैसा और राजू का पैसा व्यापार में मत लगाइए इसे रोक लीजिए, यही पैसा अब काम देगा। अब हम लोग बूढ़े हो गए हैं। सूरज जी(लेखक) के अनुसार इन लोगों पर तो भरोसा ही नहीं करना है, क्या जाने कब हम लोगों को बाहर कर दे।

विमल गंगा राम से बोली--

जरा रुकिए आपके लिए लिट्टी बनाकर लाती हूँ।

लेट हो जाएगा कलेक्शन के लिए बाजार जाना है।

नहीं सब बना है सिर्फ तेल में तल कर लेकर आती हूँ।

जल्दी करो, विमला भीतर जाकर चिंतामणि से बबलू के सामने पूछी, बड़ीबहु तेल कहा है, लिट्टी छानना है?

चिंतामणि बोली -- तेल नहीं है, लिट्टी नहीं छनायेगा, तेल बहुत लगता है।

वहीं पर बबलू भी था, बबलू कुछ नहीं बोला।

विमला चुपचाप लौट कर अपने कमरे में आकर रोने लगी। गंगाराम के पूछने पर सब बात बतायी।

इसी बीच बबलू फोन हाथ में रखे आगया।

माँ क्या हुआ? चली आई? देखो ना हमको भी कई रोज से मन है लिट्टी खाते, तो चिंतामणि को ध्यान नहीं है।

क्या करें, उसको हम अधिकार दे दिए हैं कि खाना-पीना में तुम को जो अच्छा लगे बनाओ। यह कहते हुए और फ़ोनपर बात करते बबलू चला गया।

गंगाराम खड़ा-खड़ा देख सुन रहा था।

तब गंगाराम बोला-- देखो विमला इनलोगो को समझाने से कुछ नहीं होगा। हम दोनों आदमी अब अपने खाना बनाओ और खाओ, इन लोगो का भरोसा छोड़ो। आज से एक पैसा भी कमाओ उसे बचा कर रखो, अब इस में से एक पैसा भी इन लोगों को नहीं देना है।

छाती में मुक्का मार लो कि बेटा बहू जिंदा रहते हुए भी नहीं है। क्योंकि, अब यह लोग ले तो लेंगे लेकिन किसी रूप में लौटाने लायक नहीं रह गया। इसका विवेक , लाज, लिहाज, वहदारी सब खत्म हो गया। समझी की नहीं ?

विमला भी दुखी मन से रोती हुई, ठीक है समझ गयी।

देखिए 9 महीने पेट में रखा, बबलू को पालने में उसके देह में सरसों तेल कम से कम 100 किलो लगाये होंगे, आज 100 ग्राम तेल मांगा सौक से लिट्टी के लिए सो रोक दिया। अब इन लोगों पर क्या भरोसा है, ठीक है बेटा पुतोह है बोलचाल तो रखेंगे ही लेकिन इन लोगों पर कभी विश्वास नहीं करेंगे।

एक बात बबलू बोल रहा था कि पिताजी को कहो की मुझे हिसाब दिखा देने के लिए। मेरा उम्र 30 वर्ष हो गया दो लड़का भी हो गया, अब तक एक फॉर्म में मेरा क्या औकात है याने मेरा अपना पूजी कितना है।

तुम क्या कहीं विमला ?

मैं यहीं कहीं की, हिसाब क्या बटवारा ही करवा लो। दोनों नया मकान बन ही रहा है दोनों भाई के लिए। एक तुम ले लो और दूसरा राजू को देदो, और यह मकान हम दोनों के लिए छोड़ दो। और रहा पूंजी, तुम रेवा कर के पिताजी को दिखा दो की कितना का माल गोदाम में है, कितना उधार पर है, कितना पैसा बैंक में है, सबको जोड़ लो और तीन जगह बांट लो। अपने अपने भाग्य से कमाओ और धन बढ़ाओ।

एक रोज गंगाराम बैठा हुआ था कि उस समय बबलू हिसाब लेकर आया। पिताजी यह देखिये हिसाब, अब पूंजी तेरह लाख बचा है सब काट-कूट कर। तो मैं क्या करूं ? इसे बाँट दीजिए।

विमला सुनती हो , बबलू बोल रहा है बंटवारा करने के लिए।

विमला-- बाँट दीजिए, रोज-रोज का क्लेश समाप्त हो जाएगा।

गंगाराम जा बबलू तुम ही अपनी ईमानदारी से बटवारा का कागज़ बनवा कर लाओ, हम लोग उस पर हस्ताक्षर कर देंगे।

वही हुआ बबलू और चिंतामणि वकील से कागज बनवाकर लाया, गंगाराम और विमला अपना हस्ताक्षर कर दिया।

बटवारा तीन जगह हुआ एक हिस्सा गंगाराम और विमला, दूसरा हिस्सा बबलू चिंतामणि और तीसरा हिस्सा राजू और प्रीति के नाम।

आखिरकार चिंतामणि बटवारा करवा ही लिया।

एक दिन बबलू के साथ चिंतामणि आयी और बोली आप लोग हमलोगो के साथ खाना खाइए।

विमला बोली-- नहीं बहू, तुम ठीक हो अपने बाल बच्चो का देखभाल करो, हम लोग को अभी छोड़ो बाद में देखा जाएगा।

बबलू बड़ा बेटा तराक से बोला-- मम्मी अभी पापा ठीक-ठाक है काम करने वाले हैं तो मेरे साथ नहीं रहेंगे, जब देह गिर जायेगा तब हम लोगों के साथ रहोगे?

विमला के आँख में आंसू टपक गया, आंखें पौंछते हुए बोली जा बेटा तुम खुश रहो अपना सोचो। कल किसका क्या होगा किसने देखा, जा अपना काम देख हम लोगों की चिंता मत कर।

एक दिन बबलू आया और मम्मी से बोला-- मम्मी तुम तो जानती हो मुझे जो पूजी मिला वह सब लहाना में ही था, तो एक साल हो गया है लहाना नहीं तसलया है। इसलिए पापा को बोलो की कहीं से एक लाख रुपये का इंतजाम कर दे, पापा को मैं लौटा दूंगा।

विमला झट से बोली-- देखो बेटा अब तुम्हारी शादी हो गई है बटवारा हो गया है हिसाब बारी सब जान गया, अब तुम्हे पापा से एक फूटी कौड़ी भी नहीं मिलेगी।

बबलू रोने लगा। गंगाराम देखा बात को समझा, देखो पैसा मिलेगा लेकिन सर्त है छह महीने के अंदर लौटाना होगा, बोलो मंजूर है।

थोड़ी देर बाद बोला हाँ, मुझे मंजूर है।

गंगाराम देने के लिए तैयार हो गया, लेकिन विमला अब बबलू का विश्वास नहीं करते हुए इंकार कर दिया।

अन्ततः सूरज जी(लेखक) का उपदेश "जो व्यक्ति एक बार भी जीवन में धोखा दे तो उससे सतर्क हो जाएं" को विमला एवं गंगाराम ने जीवन में अपनाया और आगे धोखा खाने से बच गए।

समाप्त