अकबर-बीरबल की कहानी: सजा का आधा हिस्सा|akbar-birbal : Saja Ka Aadha Hissa Short Story in Hindi

AuthorSmita MahtoJun 28, 2024

यह कहानी उस समय की है जब बीरबल, जिन्हें उस समय महेश दास के नाम से जाना जाता था, की पहली मुलाकात शहंशाह अकबर से हुई थी। एक बार बाजार में महेश दास की चतुराई देख कर शहंशाह अकबर ने उन्हें पुरस्कार देने का निश्चय किया और उन्हें अपने दरबार में बुलाने के लिए अपनी अंगूठी दे दी।

कुछ समय बाद, महेश दास ने अकबर से मिलने का फैसला किया और महल की ओर चल पड़े। महल के द्वार पर पहुँचने पर उन्होंने देखा कि वहाँ लंबी कतार लगी हुई है और दरबान प्रत्येक व्यक्ति से कुछ न कुछ लेकर अंदर जाने दे रहा है। जब महेश दास की बारी आई, तो उन्होंने दरबान को अंगूठी दिखाई और कहा कि शहंशाह ने उन्हें पुरस्कार देने के लिए बुलाया है। दरबान ने लालच में आकर कहा कि वह उन्हें केवल तभी अंदर जाने देगा जब महेश दास उसे पुरस्कार का आधा हिस्सा देंगे।

महेश दास ने दरबान की शर्त मान ली और दरबार में प्रवेश किया। जब उनका नाम पुकारा गया, तो शहंशाह अकबर ने उन्हें पहचान लिया और उनकी बहुत प्रशंसा की। अकबर ने उनसे पूछा कि वे इनाम में क्या चाहते हैं। महेश दास ने पूछा कि क्या वे जो भी मांगेंगे, उन्हें मिलेगा। अकबर ने हामी भरी। इस पर महेश दास ने कहा कि वे अपनी पीठ पर 100 कोड़े लगवाने का इनाम चाहते हैं।

सब हैरान हो गए और अकबर ने पूछा कि वे ऐसा क्यों चाहते हैं। महेश दास ने तब दरबान के साथ हुई पूरी घटना बताई और कहा कि उन्होंने दरबान को इनाम का आधा हिस्सा देने का वादा किया है। अकबर ने गुस्से में आकर दरबान को सजा के तौर पर 100 कोड़े लगवाए और महेश दास की चालाकी से प्रभावित होकर उन्हें अपने दरबार का मुख्य सलाहकार नियुक्त कर दिया और उनका नाम बदलकर बीरबल रख दिया। इस प्रकार, अकबर और बीरबल के कई विख्यात किस्से प्रचलित हुए।

कहानी से सीख यह है कि हमें हमेशा ईमानदारी से काम करना चाहिए और लालच से बचना चाहिए, क्योंक

ि अंत में सच्चाई और चालाकी हमेशा ऊपर उठती है।